दोस्तो, आपके सामने प्रस्तूत करता हुं कविता या गीतके बजाय.. जीवनके बारे में मंथन..
जीवन स्वयं एक गीत है..जीन्दगी प्यारका गीत है,…मूढ और दुरगूणी यह नही समझ सकते की कीतना प्यार अविरत उसका मील रहा है. जीवनम सर्व भूतेषु एसा कृष्ण भी कहते हे कि, मे ही जीवन हूं…
आयुर्वर्ष शतम नृणा परिमीतम, रात्रम तद अर्धम गतम
तस्यां अर्धस्य परस्स्त धर्म सहीतम बालस्त व्रुद्धो
शेशम व्याधी दुःख सहितम सेवाभिदी नीयते
जीवे वारि तरंग बुदबुदसमे सोख्यम कुतः प्राणीनाम ?
सभी कुछ होता है ईस तरक्की के इस जमानेमें
अचरजकी बात है आदमी इन्सान नही होता (अज्ञात)
जीवन क्या है ?
एक पवित्र यज्ञ ।
लेकिन उन्हीके लिए जो सत्य के लिए स्वयं कि आहुति देनेको तैयार होते है ।
जीवन क्या है ?
एक अमूल्य अवसर ।
लेकिन उन्हीके लिए जो साहस, संकल्प और श्रम करते है ।
जीवन क्या है ?
एक वरदान देती चुनौती |
लेकिन उन्ही के लिए जो उसे स्वीकारते है , और उसका सामना करते है
जीवन क्या है ?
एक महान संघर्ष ।
लेकिन उन्हीके लिए जो स्वयंकी शक्तिको इकठ्ठा कर विजय के लिए ज़ूज़ते है |
जीवन क्या है ?
एक भव्य जागरण ।
लेकिन उन्ही के लिए जो स्वयं कि निंद्रा और मूर्छा से लड़ते है
जीवन क्या है ?
एक दिव्य गीत ।
लेकिन उन्हीके लिए जिन्होंने स्वयं को प्र्मात्माका वाद्य बना लिया है॥
अन्यथा , जीवन एक लम्बी और धीमी मृत्यु के अतिरिक्त और कुछ भी नही है ।
जीवन वही हो जाता है, जो हम जीवनके साथ करते है ।
जीवन मिलता नहीं, जीता जाता है
जीवन स्वयं के द्वारा स्वयं का सतत सृजन है। वह नियति नही निर्माण है ।
एक विधिवेत्ता ने अपनी अति लम्बी और उबानेबाली जिरहके मध्यमें क्रोधसे न्यायाधीश को कहा: “महानुभाव, जूरी सोए हुए है !” न्यायाधीश ने कहा : “मित्र , आपने ही उन्हें सूला दिया है । कृपा करके कुछ ऐसा कीजिए कि वे जाग सकें । मै भी बिचमें कई बार सोते सोते बचा हूँ। “
जीवन सोया हुआ अनुभव हो तो जानना चाहिए कि हमने कुछ किया है, जिससे वह सो गया है ।
जीवन दुःख प्रतीत हो तो जानना चाहिए कि हमने कुछ किया है, जीससे वह दुःख हो गया है ।
जीवन तो हमारी ही प्रतिध्वनी है ।
वह तो हम्नारा ही प्रतिफलन है |
मानवता का बीज ह्रुदयमें जब अंकूरित होता है ,
तब स्रुष्टीके बागमें मानव जीवन उन्नत होता है |
-दीलीप गज्जर.

जीवन वही हो जाता है, जो हम जीवनके साथ करते है ।
जीवन मिलता नहीं, जीता जाता है
जीवन स्वयं के द्वारा स्वयं का सतत सृजन है। वह नियति नही निर्माण है ।
very refreshing thoughts … philosophical poem, reciting, a new approach … a new side of you. really liked it.
By: Daxesh Contractor on January 31, 2011
at 5:19 pm
Dilipbhai,
Nice SAMJAN on JIVAN .
Very nicely recited by you.
Jivan Ek Van
E VanMa Panth Jaate Ja Padvo Rahe….Je Bane Apani Pahechan !
DR. CHANDRAVADAN MISTRY (Chandrapukar)
http://www.chandrapukar.wordpress.com
Dilipbhai..Hope to see you for GANDHIJI’s Post !
By: DR. CHANDRAVADAN MISTRY on February 1, 2011
at 9:42 pm
बहोत खूब!!!जीवन की परिभाषा बहोत ही अच्छे अंदाज़ में। बाह!
By: razia mirza on February 7, 2011
at 7:51 am